भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण-पत्र को लेकर चल रहा विवाद अब निर्णायक दौर में पहुंच गया है। जबलपुर हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए स्पष्ट किया है कि अब यह तय करना ही होगा कि मंत्री बागरी राजपूत हैं या दलित (अनुसूचित जाति), और यह फैसला केवल जांच के आधार पर ही होगा।
कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए पूछा कि आखिर पिछले एक साल से जांच की फाइल को लंबित क्यों रखा गया। साथ ही सख्त निर्देश दिए कि उच्च स्तरीय जांच समिति 60 दिनों के भीतर अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश करे। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि अब किसी भी तरह की देरी स्वीकार नहीं की जाएगी।
क्या है पूरा विवाद?
मामले की जड़ अलग-अलग क्षेत्रों में ‘बागरी’ समुदाय की सामाजिक स्थिति को लेकर है। याचिका में दावा किया गया है कि बघेलखंड, बुंदेलखंड और महाकौशल में बागरी समाज को राजपूत वर्ग से जोड़ा जाता है, जबकि मालवा-निमाड़ क्षेत्र में इसे अनुसूचित जाति (एससी) के रूप में मान्यता मिली हुई है। आरोप है कि प्रतिमा बागरी ने इसी क्षेत्रीय भिन्नता का फायदा उठाकर एससी वर्ग का जाति प्रमाण-पत्र बनवाया, जिससे एक वास्तविक दलित उम्मीदवार के अधिकारों का हनन हुआ।
हाईकोर्ट का सख्त रुख
जबलपुर हाई कोर्ट ने साफ कहा है कि अब यह विवाद अनुमान या राजनीतिक आरोपों से नहीं, बल्कि दस्तावेजी जांच से तय होगा। कोर्ट ने सरकार को जवाबदेह ठहराते हुए पूछा कि इतनी गंभीर संवैधानिक प्रकृति के मामले में देरी क्यों की गई।
राजनीतिक असर
इस पूरे मामले ने प्रदेश की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। कांग्रेस ने कोर्ट की सख्ती को अपनी दलीलों की जीत बताते हुए दावा किया है कि जांच रिपोर्ट आने के बाद मंत्री पद पर असर पड़ सकता है। अब सबकी नजर जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी है, जो तय करेगी कि प्रतिमा बागरी का जाति प्रमाण-पत्र वैध है या नहीं, और इसी के साथ उनका राजनीतिक भविष्य भी तय होगा।


