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कांग्रेस दफ्तर : विरासत, विवाद और ‘नए पते’ की राजनीति

दिल्ली के लुटियंस जोन में स्थित 24, अकबर रोड का बंगला केवल एक इमारत नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के लंबे दौर का साक्षी रहा है। अब संपदा विभाग की ओर से कांग्रेस को 28 मार्च तक यह दफ्तर खाली करने का नोटिस दिए जाने के बाद यह मुद्दा फिर सुर्खियों में है। दिलचस्प यह है कि कांग्रेस अपना मुख्यालय पहले ही इंदिरा भवन में शिफ्ट कर चुकी है, फिर भी पुराने पते को छोड़ने में उसकी अनिच्छा साफ दिखती है। यही वह बिंदु है, जहां इतिहास, भावनाएं और राजनीति आपस में टकराते नजर आते हैं। करीब 46 साल तक 24, अकबर रोड कांग्रेस की पहचान बना रहा। 1978 में पार्टी में टूट के बाद जब यह दफ्तर यहां शिफ्ट हुआ, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि यह बंगला आने वाले दशकों में कांग्रेस की सत्ता वापसी और बड़े फैसलों का केंद्र बनेगा। यही कारण है कि इसे ‘बर्मा हाउस’ और कांग्रेस का ‘लकी चार्म’ भी कहा जाता रहा। इसी परिसर ने इंदिरा गांधी से लेकर मनमोहन सिंह तक चार प्रधानमंत्रियों के दौर को देखा। लेकिन जब समय बदला, तो है राजनीति भी बदली। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद राजनीतिक दलों को लुटियंस जोन से बाहर नए मुख्यालय बनाने पड़े। भाजपा ने 2018 में अपना नया दफ्तर बना लिया और कांग्रेस ने भी आखिरकार जनवरी 2025 में इंदिरा भवन में शिफ्ट होकर नया अध्याय शुरू किया। बावजूद इसके, कांग्रेस का पुरानी इमारत से मोह पूरी तरह छूट नहीं पाया। नेताओं की आवाजाही और राजनीतिक गतिविधियों की वजह से यह स्थान अब भी कांग्रेस की स्मृतियों का केंद्र बना हुआ है। सरकार का तर्क है कि जब आवंटन रद्द हो चुका है, तो बंगला खाली होना चाहिए। दूसरी तरफ कांग्रेस इसे राजनीतिक भेदभाव के नजरिए से देख रही है और सवाल उठा रही है कि अन्य दलों के पुराने दफ्तरों पर ऐसी सख्ती क्यों नहीं दिखती? इसी बहस ने इस मुद्दे को एक साधारण प्रशासनिक प्रक्रिया को राजनीतिक विवाद में बदल दिया है। अब सवाल यह है कि क्या राजनीति में पते का बदलना केवल औपचारिकता होता है, या फिर उससे जुड़ी भावनाएं भी उतनी ही मजबूत होती हैं? 24, अकबर रोड का मामला बताता है कि इमारतें केवल दीवारें नहीं होतीं, वे इतिहास, सत्ता और संघर्ष की स्मृतियों को समेटे होती हैं। फिर भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नियमों और परंपराओं के बीच संतुलन जरूरी है। आने वाले दिनों में अब यह देखना होगा कि यह कांग्रेस का अकबर रोड दफ्तर विवाद अदालत तक जाता है या किसी राजनीतिक समझौते से सुलझता है।

-मिलिंद ठाकरे

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