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संपादकीय: जनता ने पार्षद चुना है, पार्षद का पति नहीं!

जनता ने वोट दिया, प्रतिनिधि चुना और उम्मीद की कि जरूरत पड़ने पर उसकी आवाज सुनी जाएगी। लेकिन यदि जनता फोन लगाए और प्रतिनिधि उपलब्ध न हो, शिकायत बताने के लिए पति, बेटे, भाई या किसी और के भरोसे रहना पड़े, तो सवाल उठना लाजिमी है-आखिर जनता ने प्रतिनिधि किसे चुना था?
स्थानीय निकायों में महिला जनप्रतिनिधियों को लेकर समय-समय पर ऐसी शिकायतें सामने आती रही हैं कि फोन बंद है, कॉल उठता नहीं या फिर फोन उठाने की जिम्मेदारी परिवार के किसी सदस्य ने संभाल रखी है। यह व्यवस्था भले सुविधा जनक लगे, लेकिन लोकतंत्र के लिहाज से यह गंभीर सवाल खड़ा करती है।

जनता को अपने चुने हुए प्रतिनिधि से बात करने के लिए किसी ‘मध्यस्थ’ की जरूरत क्यों पड़े? महिला आरक्षण का मकसद केवल चुनावी आंकड़ों में महिलाओं की संख्या बढ़ाना नहीं था। इसका उद्देश्य था कि महिलाएं स्वयं निर्णय लें, बैठकों में अपनी बात रखें और जनता की समस्याओं को सीधे शासन-प्रशासन तक पहुंचाएं। लेकिन यदि कुर्सी महिला की हो और फैसले कोई और करे, फोन कोई और उठाए और जनता से संवाद भी कोई और करे, तो फिर सवाल उठेगा ही कि आरक्षण आया किसके लिए-प्रतिनिधित्व के लिए या प्रतिनिधि के नाम पर परिवार के लिए? परिवार का सहयोग गलत नहीं है। पति, बेटे या अन्य परिजन मदद कर सकते हैं। लेकिन मदद और अधिकार में फर्क होता है। सहयोगी बनना अलग बात है और निर्वाचित प्रतिनिधि की भूमिका अपने हाथ में लेना अलग। जनता ने अपना वोट किसी परिवार को नहीं, एक निर्वाचित प्रतिनिधि को दिया है। बैठकों में भी यदि महिला प्रतिनिधि के साथ आया परिजन ही बोलता दिखाई दे, अधिकारियों को निर्देश देता नजर आए या निर्णय की दिशा तय करने लगे, तो यह केवल शिष्टाचार का मामला नहीं रह जाता। इससे यह सवाल खड़ा होता है कि निर्वाचित पद की वास्तविक कमान आखिर किसके हाथ में है?

लोकतंत्र में हर फोन उठाना कानूनन अनिवार्य नहीं हो सकता, लेकिन जनता के प्रति जवाबदेह रहना जनप्रतिनिधि की बुनियादी जिम्मेदारी जरूर है। यदि नागरिक को अपनी समस्या बताने के लिए पहले पति, फिर बेटे और फिर किसी सहायक का नंबर खोजना पड़े, तो यह कैसा जनप्रतिनिधि ?जनप्रतिनिधित्व की यह कैसी व्यवस्था? स्थानीय निकायों को कम से कम इतना सुनिश्चित करना चाहिए कि निर्वाचित प्रतिनिधियों के अधिकृत संपर्क नंबर सार्वजनिक और सक्रिय रहें, शिकायतों की नियमित निगरानी हो और नागरिकों को सीधे संवाद का रास्ता मिले। आरक्षण ने महिलाओं को कुर्सी तक पहुंचाया है। अब यह भी दिखना चाहिए कि उस कुर्सी पर निर्णय लेने का अधिकार किसके पास है। क्योंकि जनता ने प्रतिनिधि चुना है, प्रतिनिधि का प्रतिनिधि नहीं।

-मिलिंद ठाकरे

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