जब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी भविष्य की सत्ता और संभावित नेतृत्व की चर्चा सार्वजनिक मंचों से कर रहे हैं, उसी समय पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह (राहुल भैया) मप्र में बिल्कुल अलग तरह के ‘साइलेंट कैंपेन’ पर निकल पड़े हैं। वे चुपचाप जिलों में घूम रहे हैं, पुराने कांग्रेसियों से मिल रहे हैं और संगठन की धड़कन को समझने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि राजनीति में यह तरीका नया नहीं है, लेकिन असामान्य जरूर लगता है। जब अधिकांश नेता सोशल मीडिया और बड़ी रैलियों पर ज्यादा भरोसा करते हैं। अजय सिंह का यह ‘साइलेंट कैंपेन’ केवल दौरा भर नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है। विंध्य की सीमाओं से बाहर निकलकर चंबल और बुंदेलखंड में सक्रियता बढ़ाना इस बात का संकेत है कि वे अपने प्रभाव क्षेत्र को व्यापक बनाना चाहते हैं। साथ ही, अपने पिता और पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह पुराने संगठनात्मक नेटवर्क को फिर से सक्रिय करने की कोशिश भी साफ दिखाई देती है। कांग्रेस में लंबे समय से यह शिकायत रही है कि कई समर्पित कार्यकर्ता हाशिए पर चले गए हैं। राहुल का यदि यह ‘कैंपेन’ सचमुच उन कार्यकर्ताओं को फिर से सक्रिय कर पाता है, तो इसका असर प्रदेश में भविष्य की राजनीति में दिख सकता है। उनका ‘तीन साल तक माला नहीं पहनूंगा’ का संकल्प भी प्रतीकात्मक राजनीति का हिस्सा है। यह संदेश देता है कि वे फिलहाल सम्मान या पद की राजनीति से दूर रहकर संगठन को मजबूत करना चाहते हैं। हालांकि राजनीति में प्रतीक अक्सर रणनीति का ही हिस्सा होते हैं और यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक इसे 2028 के चुनावों से पहले अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश के रूप में भी देख रहे हैं। कुल मिलाकर, कांग्रेस के भीतर पूर्व नेता प्रतिपक्ष का यह ‘साइलेंट कैंपेन’ एक दिलचस्प प्रयोग है। यदि यह ‘कैंपेन’ प्रदेश के कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने में सफल रहता है, तो आने वाले वर्षों में यह कांग्रेस पार्टी की आंतरिक राजनीति और नेतृत्व समीकरण दोनों को प्रभावित कर सकता है।
-मिलिंद ठाकरे


