सरकारी धान के परिवहन में ‘खेल’! संदिग्ध ट्रक की जांच सवालों के घेरे में

बालाघाट। सरकारी धान से भरा एक संदिग्ध ट्रक पकड़ा गया, लेकिन जांच की दिशा ही सवालों में घिर गई। अनुबंध के नियमों से ज्यादा दूरी, बिना बिल्टी परिवहन और फिर चुपचाप कार्रवाई से बचाव करने की कवायद। आखिर हर बार सचदेव राइस मिल सरकारी कमियों का लाभ लेकर कैसे बेदाग बच जाता है ? क्या इसे बचाने के लिए प्रशासन में छिपा कोई विभिषण है जो गुप्त सूचनाओं को यहां-वहां कर उसे बचा लेता है! यह भी एक जांच का विषय है जिसकी जांच होनी आवश्यक इसीलिए हो जाती है क्योंकि यह केवल एक मामला नहीं है ऐसे और भी मामले सामने आ सकते है।
अनुबंध बनाम हकीकतः दूरी में छुपी गड़बड़ी
बालाघाट में शासकीय धान की हेरा-फेरी का एक और मामला सामने आया है। जबलपुर स्थित मध्यप्रदेश स्टेट सिविल सप्लाई कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने 10 अक्टूबर 2025 को जिस ट्रक का अनुबंध किया, उसमें अधिकतम परिवहन दूरी 185 किलोमीटर तय थी। लेकिन संदिग्ध ट्रक बालाघाट से धान लेकर जबलपुर की ओर जा रहा था, जिसकी वास्तविक दूरी लगभग 220 किलोमीटर है। सवाल साफ है कि कम दूरी का भुगतान लेकर ज्यादा दूरी तक धान कैसे पहुंचाया जा रहा था? क्या यह सिर्फ कागजी गलती है या फिर सोची-समझी अनियमितता? जो मिलीभगत से सरकार को चूना लगाया जा रहा था।
क्या है पूरा मामला
8 दिसंबर 2025 को जबलपुर से शासकीय धान से लदा ट्रक बालाघाट के लिए रवाना हुआ। 13 दिसंबर को तहसीलदार टेकाम ने संदेह के आधार पर ट्रक को जब्त कर चांगोटोला थाने में खड़ा कराया। शुरुआती जांच में स्पष्ट हुआ कि यह धान सचदेव राइस एण्ड सार्टेक्स मिल से जुड़ा है। बतादें कि यह वही मिल है, जिसके संचालक समीर सचदेव हैं और इन पर पहले भी शासकीय धान की चोरी और तस्करी जैसे गंभीर आरोप लग चुके हैं। ऐसे में इस प्रकरण ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए।
बिल्टी के बिना धान का सफर
सूत्रों के मुताबिक, जिस शासकीय भंडारण गृह से धान भेजा गया, उसकी ऑनलाइन बिल्टी जारी ही नहीं हुई थी। इसके बावजूद ट्रक बालाघाट के लिए निकल गया। मामला सामने आने के बाद फर्जी बिल्टी तैयार कर लीपापोती की कोशिशें शुरू हो गईं। जांच की जिम्मेदारी जिला आपूर्ति अधिकारी आर.के. ठाकुर को सौंपी गई, लेकिन उनकी कथित नजदीकियां मील संचालक सचदेव से जगजाहिर बताई जा रही हैं। ऐसे में जांच निष्पक्षता से की गई होगी इसपर भी संदेह होना स्वाभाविक हो जाता है।
जांच या दिखावा?
सूत्रों का दावा है कि राजनीतिक दबाव और व्यक्तिगत संबंधों के चलते वरिष्ठ अधिकारियों को भ्रामक ही नहीं बल्कि वास्तविकता से परे जानकारी दी गई। नतीजा यह हुआ कि जब्त ट्रक पर कोई ठोस कार्रवाई सबूतों के अभाव में नहीं हुई और अंततः उसे छोड़ दिया गया। जिसका सीधा लाभ मील संचालक समीर सचदेव को मिला, जबकि सरकारी धान की सुरक्षा सवालों के घेरे में रह गई। ऐसे में जांचकर्ता अधिकारी की ईमानदारी पर भी सवाल खड़े होना लाजमी है।
उठते अनसुलझे सवाल
क्या टोल नाकों पर फास्टैग या मूल टोल रसीदों का सत्यापन किया गया? क्या लोक निर्माण विभाग के दूरी प्रमाण-पत्र का मिलान अनुबंध के समय किया गया? ट्रक में लदे बोरों की संख्या और वजन के साथ ओवरलोडिंग की विधिवत जांच क्यों नहीं उजागर हुई? जिला आपूर्ति अधिकारी और तहसीलदार एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते नजर आए आ रहे हैं। सवाल यही है, क्या यह लापरवाही है या शासकीय धान की हेरा-फेरी में विभिषणों द्वारा मिला संरक्षण है?