संघ का ‘संभाग माडल’, प्रभाव के विस्तार की नई पटकथा

संपादकीय।मिलिंद ठाकरे

देश के सबसे अधिक राज्यों में सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को वैचारिक दिशा देने वाला संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अब अपने आंतरिक ढांचे में बड़े बदलाव की ओर बढ़ चुका है। यह बदलाव केवल संगठनात्मक पुनर्संरचना नहीं, बल्कि उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसके जरिए संघ जड़ों तक पहुंचकर अपने सामाजिक और अप्रत्यक्ष राजनीतिक प्रभाव को और मजबूत करना चाहता है। करीब 19 साल बाद संघ ने 46 प्रांतों की पुरानी व्यवस्था समाप्त कर 84 संभागों का नया ढांचा तैयार करने का निर्णय लिया है। मध्यप्रदेश में भी यह बदलाव साफ दिखाई देगा, जहां मालवा, महाकौशल और मध्यभारत जैसे तीन प्रांतों की जगह अब सात संभाग-इंदौर, उज्जैन, जबलपुर, सागर, रीवा, ग्वालियर और भोपाल बनाए गए हैं। हर संभाग में एक संभागीय प्रचारक होगा, जिसे प्रांत प्रचारक जैसी ही शक्तियां और जिम्मेदारियां दी जाएंगी। यह कदम संघ की कार्यप्रणाली को और अधिक विकेंद्रीकृत बनाता है। जिसमें संघ छोटी-छोटी इकाइयों के जरिए अब स्थानीय स्तर पर अधिक सक्रिय और प्रभावी भूमिका बढ़ायेगा। समाज के विभिन्न वर्गों तक उसकी पहुंच भी गहरी और व्यापक होगी। हरियाणा के समालखा में हुई अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में लिया गया यह निर्णय 1 अप्रैल 2027 से लागू होगा। संघ ने इसे लागू करने के लिए समय इसलिए रखा है, ताकि नई व्यवस्था को चरणबद्ध तरीके से मजबूत आधार दिया जा सके। संघ के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर मध्यभारत में आयोजित 1569 हिन्दू सम्मेलनों में 52 लाख से अधिक लोगों की भागीदारी इस बात का संकेत है कि संघ अपनी सामाजिक पकड़ को लगातार विस्तार दे रहा है। 27 लाख से अधिक परिवारों से संपर्क और हजारों प्रमुखजनों की भागीदारी इस रणनीति की सफलता को भी दर्शाती है। साफ है यह ‘संभाग माडल’ केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि संघ की उस दीर्घकालिक योजना का हिस्सा है, जिसके जरिए वह समाज के हर स्तर पर अपनी मौजूदगी और प्रभाव को और गहरा करना चाहता है। यही नहीं इसका असर आने वाले समय में भाजपाई राजनीति में भी साफ दिखाई देगा।

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