मप्र में भाजपा ने 7 से 12 अप्रैल के बीच प्रदेशभर में ‘गांव-बस्ती चलो अभियान’ चलाने का फैसला किया है। यह सिर्फ एक संगठनात्मक कार्यक्रम नहीं, बल्कि ग्रामीण राजनीति की नब्ज टटोलने और उसे अपने पक्ष में मजबूत करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। प्रदेश की राजनीति में गांव हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं, इसलिए मंत्री, विधायक और सांसदों का सीधे गांव-बस्तियों तक पहुंचना आने वाले राजनीतिक समीकरणों का संकेत भी माना जा रहा है। इस अभियान की खासियत यह है कि इसे केवल औपचारिक सभाओं तक सीमित नहीं रखा गया है। पार्टी नेतृत्व ने नेताओं को निर्देश दिए हैं कि वे भाषणों से आगे बढ़कर गांव के लोगों से सीधा संवाद करें। हर विधानसभा क्षेत्र के 50 बड़े गांवों का चयन कर वहां कार्यक्रम आयोजित करने की योजना यह दर्शाती है कि भाजपा संगठनात्मक स्तर पर अपनी जड़ों को और मजबूत करना चाहती है। पिछले कुछ समय से ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न मुद्दों को लेकर असंतोष की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं, ऐसे में यह पहल राजनीतिक दृष्टि से अहम मानी जा रही है। अभियान का एक महत्वपूर्ण पहलू पुराने और वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के घर जाकर उनका सम्मान करना भी है। अक्सर यह शिकायत सुनाई देती है कि सत्ता में आने के बाद दल अपने जमीनी कार्यकर्ताओं से दूरी बना लेते हैं। ऐसे में भाजपा का यह कदम संगठन के भीतर सकारात्मक संदेश देने का प्रयास माना जा सकता है। पुराने कार्यकर्ताओं का अनुभव और नए कार्यकर्ताओं की ऊर्जा को साथ लेकर चलने की यह कोशिश संगठन को मजबूती दे सकती है। हालांकि किसी भी अभियान की सफलता केवल कार्यक्रमों की संख्या या भीड़ से तय नहीं होती। असली चुनौती यह है कि नेता और कार्यकर्ता ग्रामीण जनता की समस्याओं को कितनी गंभीरता से सुनते और समझते हैं। किसान, युवाओं के रोजगार, स्थानीय विकास और बुनियादी सुविधाओं जैसे मुद्दे आज भी गांवों की प्राथमिक चिंताएं हैं। यदि इन पर सार्थक संवाद और समाधान की दिशा में पहल होती है, तो यह अभियान जनविश्वास बढ़ाने में भी मददगार साबित हो सकता है। सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों से मिलना और उनके अनुभव साझा करना भी इस अभियान का हिस्सा बनाया गया है। इसके जरिए सरकार अपनी योजनाओं की उपलब्धियां सीधे लोगों तक पहुंचाना चाहती है। साथ ही सोशल मीडिया के माध्यम से इन अनुभवों को साझा कर व्यापक स्तर पर संदेश देने की तैयारी यह दिखाती है कि अब ग्रामीण राजनीति भी डिजिटल प्रचार से जुड़ चुकी है। निहितार्थ यह कि, ‘गांव-बस्ती चलो अभियान’ भाजपा के लिए महज जनसंपर्क कार्यक्रम नहीं, बल्कि गांव-गांव अपनी जमीनी पकड़ को परखने और मजबूत करने की एक राजनीतिक कवायद है। देखना यह कि भाजपा की यह पहल केवल रणनीति तक सीमित रहती है या ग्रामीण राजनीति में कोई ठोस संदेश देने में सफल होती है।
-मिलिंद ठाकरे


